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Showing posts from March, 2022

यूक्रेन संकट: भारत के प्रत्यावर्तन प्रयास कितने सफल रहे?

 भारत ने यूक्रेन में युद्ध से भाग रहे करीब 18,000 लोगों को वापस भेज दिया है। कुछ ने सरकार के कार्यों की प्रशंसा की है, जबकि कुछ ने कहा है कि प्रयास पर्याप्त नहीं थे। भारत ने युद्धग्रस्त यूक्रेन में फंसे भारतीयों के लिए ऑपरेशन गंगा बचाव अभियान का अंतिम चरण पूरा कर लिया है।13 दिनों के भीतर, यूक्रेन में रह रहे अनुमानित 20,000 भारतीय नागरिकों में से लगभग 18,000 को निकाल लिया गया और भारत ले जाया गया। गुरुवार को यह कार्रवाई खत्म हो गई।भारतीयों को रोमानिया, पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और मोल्दोवा के शहरों से उड़ाया गया था क्योंकि उन्होंने यूक्रेन में सीमा पारगमन बिंदुओं को पार किया था।यूक्रेन में भारतीय दूतावास के साथ मिलकर काम करने वाले विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने शुक्रवार को ट्वीट किया कि ऑपरेशन गंगा "विशेष रूप से" चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है और समन्वय प्रयासों में शामिल लोगों को धन्यवाद देता है।"यूक्रेन और रूस में अधिकारियों के साथ-साथ निकासी सहायता के लिए रेड क्रॉस के लिए हमारा विशेष आभार," उन्होंने लिखा। यूक्रेन के पड़ोसियों - रोमानिया, हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और...

मूवी रिव्‍यू: द कश्‍मीर फाइल्‍स

कहानी इतिहास के पन्‍नों में ऐसी कई दर्दनाक घटनाएं दर्ज हैं, जिसने इंसानियत और समाज दोनों को न सिर्फ शर्मसार किया, बल्‍क‍ि ऐसा जख्‍म दिया जिसके निशान आज भी मिलते हैं। कश्‍मीर से अल्‍पसंख्‍यक हिंदू पंडितों का पलायन, उनकी दुर्दशा ऐसी ही एक सच्ची त्रासदी है। 'द कश्‍मीर फाइल्‍स'  एक ऐसी फिल्‍म है, जो आपको भावनात्मक रूप से जगाती है। यह 1990 के दशक की कश्मीर घाटी को दिखाती है। कश्‍मीरी पंडितों पर आतंकियों के जुल्‍म को दिखाती है। इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा पंडितों को उनके घरों से भागने के लिए मजबूर किए जाने की कहानी कहती है। रिव्‍यू जिस मिट्टी पर आपने जन्‍म लिया। जिस आंगन में आपका बचपन ख‍िला। जिन गलियों में आपने अपनी जवानी काटी। उस मिट्टी, उस आंगन और उन गलियों को हमेशा के लिए छोड़ना पड़े, अपने ही देश में रिफ्यूजी की तरह जिंदगी बसर करनी पड़े। इस दर्द का जिक्र करना जितना आसान है, उसे सहन करना उतना ही मुश्‍क‍िल। 'द कश्‍मीर फाइल्‍स' उस त्रासदी का दंश झेल चुके ऐसे ही लोगों की सच्‍ची कहानियों पर आधारित है। वो जिन्‍हें शरणार्थी कहा गया। फिल्‍म एक तर्क देती है कि यह सिर्फ एक पलायन नही...

लड़की हूं लड़ सकती हूं, पर कब तक?

  कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इस बार उत्तर प्रदेश चुनाव में नारा दिया- लड़की हूं लड़ सकती हूं। इसका असर भी दिखा। खासकर लड़कियों के बीच यह नारा काफी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद प्रियंका गांधी ने इस नारे को हर चुनावी राज्य में इस्तेमाल किया। यूपी में तो महिला सुरक्षा चुनावी मुद्दा भी बना। यह सिर्फ कांग्रेस या विपक्ष का ही मुद्दा नहीं, बल्कि बीजेपी का भी मुद्दा रहा। जहां विपक्ष ने महिला सुरक्षा की स्थिति पर चिंता जताई, वहीं बीजेपी ने कहा कि उसके राज में महिला सुरक्षा की स्थिति बहुत बेहतर हुई। लेकिन जो सवाल अनुत्तरित है, वह यह कि राजनीतिक दलों को महिलाओं की जो यह याद आई है, क्या वह सिर्फ चुनाव तक सीमित है या चुनाव के बाद सरकार बनने पर भी इसकी याद रहेगी? वैसे महिलाओं को लेकर राजनीतिक दलों ने जो फिक्र दिखाई, उसमें उनकी जरूरत छिपी हुई है। पिछले कुछ सालों में सभी राजनीतिक दलों को यह बात समझ में आ गई है कि महिला मतदाता जीत-हार में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए उनके लिए अलग-अलग लुभावने वादे भी किए जाने लगे। बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के वक्त भी विश्लेषकों ने यह लिखा कि नीतीश कुमार को महिल...